मैं ओडिशा में पला-बढ़ा हूं, इसलिए मानसून का मतलब जानता हूं, यह सिर्फ मौसम नहीं होता, यह किसान के जीवन की धड़कन होती है। जून का पहला बादल देखकर खेत में बीज डालने की तैयारी होती थी। आसमान का रंग पढ़कर अगले हफ्ते का अनुमान लगाया जाता था। लेकिन अब यह भरोसा टूट रहा है। बारिश आती है, लेकिन दो दिन में पूरे महीने की, फिर तीन हफ्ते की चुप्पी। फसल पहले डूबती है, फिर प्यासी रहती है। और यह सिर्फ Odisha की बात नहीं, पूरे देश में यही हो रहा है। भारत की 65% कृषि भूमि वर्षाधीन (rainfed) है, यानी सिंचाई का कोई और साधन नहीं। ऐसे में जब मानसून अविश्वसनीय हो जाए, तो यह केवल मौसम की समस्या नहीं रहती, यह खाद्य सुरक्षा, आजीविका और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की समस्या बन जाती है।
जलवायु परिवर्तन (climate change) और भारतीय कृषि का यह विषय GS1, GS3 और निबंध, तीनों में आता है। लेकिन अधिकांश उत्तरों में मैंने देखा है कि अभ्यर्थी केवल “सूखा-बाढ़” और एक-दो योजनाओं के नाम लिखकर छोड़ देते हैं। यह पर्याप्त नहीं है। मानसून क्यों बदल रहा है, फसलों पर इसका वास्तविक असर क्या है, और किस समुदाय पर यह बोझ सबसे ज्यादा पड़ता है, यह समझे बिना उत्तर अधूरा रहता है।
इस लेख में मैंने इस पूरे विषय को उसी तरह समझाया है जैसे मैं अपने 6-9 बजे के अध्ययन में तैयार करता हूं, आंकड़ों के साथ, संरचना के साथ, और जमीनी समझ के साथ।
भारतीय कृषि में मानसून का महत्व और जलवायु परिवर्तन का खतरा
दक्षिण-पश्चिम मानसून (southwest monsoon) भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75% प्रदान करता है और यह सब जून से सितंबर के बीच केवल चार महीनों में। इन्हीं चार महीनों में खरीफ फसल की बुआई होती है, जलाशय (reservoirs) भरते हैं, और भूजल (groundwater) का पुनर्भरण होता है जो रबी फसल के लिए उपयोग होता है।
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि पूरी तरह वर्षाधीन है: न नहर, न नलकूप, न कोई विकल्प। इन खेतों के लिए मानसून ही सब कुछ है। और जब यह मानसून दो सप्ताह देर से आए, तो बुआई का समय निकल जाता है। जब एक महीने की बारिश 48 घंटों में हो जाए और फिर तीन सप्ताह शांति रहे, तो फसल पहले डूबती है और फिर पानी के अभाव में सूख जाती है।
कृषि क्षेत्र भारत की लगभग 45% श्रमशक्ति (workforce) को रोजगार देता है और सकल घरेलू उत्पाद में 17-18% का योगदान करता है। इससे भी आगे, 65 करोड़ से अधिक ग्रामीण जनसंख्या की आजीविका इसी पर टिकी है। मानसून में कोई भी बड़ा व्यवधान सीधे किसान की आय, खाद्य मूल्यों और ग्रामीण ऋण के चक्र में उतरता है।
UPSC की दृष्टि से यह विषय अकेला नहीं है, यह खाद्य सुरक्षा, जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend), आंतरिक पलायन (internal migration), और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं से सीधे जुड़ा है। इन संबंधों को उत्तर में दर्शाना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन से भारत का मानसून कैसे बदल रहा है?
मानसून समाप्त नहीं हो रहा। अधिकांश वर्षों में कुल वर्षा का आंकड़ा ऐतिहासिक औसत के आसपास ही रहता है। जो बदल रहा है, वह वर्षा का स्वरूप है, और कृषि के लिए कुल वर्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका स्वरूप।
अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, वर्षा के दिन घट रहे हैं
मध्य भारत में 150 मिलीमीटर से अधिक दैनिक वर्षा वाली अत्यधिक वर्षा घटनाएं (extreme rainfall events) बीसवीं सदी के मध्य की तुलना में 75% बढ़ चुकी हैं। साथ ही वास्तविक वर्षा वाले दिनों की संख्या घट रही है।
इसका अर्थ यह है कि उतनी ही या उससे अधिक वर्षा अब बहुत कम, बहुत तीव्र झटकों में आती है। शोध बताते हैं कि भारत की मौसमी वर्षा का लगभग आधा हिस्सा अब केवल 20-30 घंटों में गिर जाता है। एक किसान दो दिन में महीने भर के पानी का उपयोग नहीं कर सकता। वह पानी बह जाता है, खेतों में बाढ़ आती है, ऊपरी मिट्टी (topsoil) बह जाती है और शेष सप्ताह सूखे रह जाते हैं।
मानसून के बीच सूखे के दौर लंबे और अधिक हानिकारक हो रहे हैं
मानसून के दौरान लंबे शुष्क अंतराल (Dry Spells), यानी ऐसे दौर जब कई दिनों तक लगभग बिल्कुल वर्षा नहीं होती, बीसवीं सदी के मध्य की तुलना में लगभग 27% बढ़ चुके हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये अंतराल तब आते हैं, जब पहली बारिश के बाद फसलें बोई जा चुकी होती हैं और उनकी वृद्धि अपने सबसे संवेदनशील चरण में होती है।
एक बार किसान पहली बारिश पर भरोसा करके बुआई कर देता है, तो उसके पास अपना निर्णय बदलने का कोई विकल्प नहीं बचता। यदि फूल आने या दाना भरने के समय लगातार दो-तीन सप्ताह तक बारिश न हो, तो फसल का नुकसान अक्सर अपूरणीय हो जाता है।
मैंने ओडिशा में यह चक्र बार-बार देखा है, पहले कुछ दिनों की मूसलाधार बारिश, फिर कई सप्ताह की खामोशी, और मौसम के अंत में चक्रवात (Cyclone) के साथ फिर से तेज वर्षा। जलवायु परिवर्तन का यही नया पैटर्न सबसे अधिक चिंता का विषय है, क्योंकि हर चरण फसल को अलग-अलग तरीके से नुकसान पहुंचाता है, शुरुआती बाढ़ बुआई को प्रभावित करती है, बीच का सूखा पौधों की वृद्धि रोक देता है, और अंत की तेज बारिश तैयार फसल को तबाह कर देती है।
वर्षा का भौगोलिक वितरण बदल रहा है: जहां होती थी वहां कम, जहां नहीं होती थी वहां ज्यादा
शायद सबसे चिंताजनक परिवर्तन यह है कि जलवायु परिवर्तन वर्षा का भौगोलिक वितरण (geographical redistribution) बदल रहा है। ऐतिहासिक रूप से शुष्क क्षेत्र ( जैसे कि राजस्थान के कुछ भाग, उत्तर कर्नाटक, मध्य महाराष्ट्र ) अब अधिक वर्षा पा रहे हैं। जबकि परंपरागत रूप से आर्द्र क्षेत्र ( जैसे कि केरल, पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी मध्य भारत ) में वर्षा घट रही है।
यह बदलाव इसलिए और खतरनाक है क्योंकि मौजूदा कृषि संरचना जैसे कि सिंचाई व्यवस्था, फसल की किस्में, मिट्टी की तैयारी और बुआई का कैलेंडर पिछली सदी की वर्षा भूगोल के अनुसार बनी है। और वह भूगोल अब उतनी तेजी से बदल रहा है जितनी तेजी से कृषि व्यवस्था अनुकूलित नहीं हो सकती।
भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
यह वह भाग है जो Mains उत्तर को साधारण से उत्कृष्ट बनाता है। ये आंकड़े NICRA (राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार), ICAR और शोध अध्ययनों से हैं। इन्हें केवल पढ़ें नहीं — याद करें।
| फसल / संकेतक | अनुमानित प्रभाव |
|---|---|
| गेहूं की उपज (NICRA अनुमान) | 6-25% की कमी संभव; अनुकूलन के अभाव में 2050 तक 19.3% की कमी |
| सिंचित धान की उपज | 2050 तक 7% और 2080 तक 10% की गिरावट |
| वर्षाधीन धान की उपज | अनुकूलन के बिना 2050 तक 20% और 2080 तक 47% की कमी |
| खरीफ मक्का की उपज | 2050 तक 18% और 2080 तक 23% की कमी |
| 1 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि का प्रभाव | सभी फसलों में राष्ट्रीय औसत उपज में लगभग 8% की कमी; कुछ जिलों में 39% तक |
| बाजरा: 1 डिग्री तापमान वृद्धि पर | 19% तक उपज में गिरावट |
| चरम मौसम प्रभावित सीमांत किसान | पिछले पांच वर्षों में 80% सीमांत किसानों ने अनुभव किया |
| IPCC अनुमानित कृषि हानि | 42,000 करोड़ रुपये: मुख्यतः सिंधु-गंगा मैदान के गेहूं उत्पादन में |
सिंधु-गंगा मैदान (Indo-Gangetic Plains) पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। पंजाब-हरियाणा से पश्चिम बंगाल तक फैला यह क्षेत्र प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ टन गेहूं उगाता है और वैश्विक गेहूं उत्पादन का करीब 15% हिस्सा है। यही क्षेत्र दाना भरने (grain filling) की अवस्था में ताप-तनाव (heat stress) के प्रति सबसे संवेदनशील है, और यही वह अवस्था है जब गेहूं का तापमान बढ़ना सबसे अधिक हानिकारक होता है।
सबसे अधिक कौन प्रभावित है?
ऊपर दिए आंकड़े राष्ट्रीय औसत हैं। लेकिन जलवायु आघात (climate shock) सबको एक जैसा नहीं लगता। सबसे कमजोर वे हैं जिनके पास इसे सहने की कोई व्यवस्था नहीं।
भारत के 80% से अधिक किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। ये लघु और सीमांत किसान (small and marginal farmers) हैं, जिनके पास न आर्थिक सुरक्षा है, न व्यावहारिक फसल बीमा, और न सिंचाई ढांचे में निवेश की क्षमता। एक खराब मानसून केवल आय नहीं घटाता, ऋण का एक ऐसा चक्र शुरू करता है जिससे बाहर निकलने में वर्षों लग जाते हैं।
वर्षाधीन किसान दोहरे संकट में है। वर्षा कम हो तो सिंचाई का कोई विकल्प नहीं। वर्षा एक साथ आ जाए तो खेत से निकालने की व्यवस्था नहीं। एक ही मौसम में बाढ़ से खरीफ जाती है और उसके बाद के सूखे से रबी खतरे में आ जाती है — बाढ़-से-सूखे का यह मौसमी उलटफेर अब भारतीय कृषि की नई सच्चाई बन चुकी है।
महिला किसान और कृषि मजदूर इस संकट में असंगत रूप से प्रभावित होते हैं। जब खेत की आमदनी टूटती है, तो परिवार के पुरुष मजदूरी के लिए शहर जाते हैं और महिलाएं सिकुड़ते संसाधनों के साथ खेत संभालती हैं। जलवायु दबाव और लैंगिक असमानताओं से जुड़ा कृषि श्रम का यह संबंध GS1 और निबंध उत्तरों के लिए एक महत्वपूर्ण आयाम है।
मानसून की अनिश्चितता से भारत की खाद्य सुरक्षा पर खतरा
भारत 140 करोड़ लोगों को खिलाता है और लगभग 80% जनसंख्या सार्वजनिक वितरण प्रणाली (public distribution system) के माध्यम से अनुदानित अनाज पर निर्भर है। खाद्य सुरक्षा की यह पूरी संरचना (जैसे कि खरीद, बफर भंडार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) इस मान्यता पर बनी है कि कृषि उत्पादकता धीरे-धीरे स्थिर बढ़ती रहेगी। जलवायु परिवर्तन इस मान्यता को चुनौती दे रहा है।
जब गेहूं और चावल ( दोनों प्रमुख खाद्यान्न ) की उपज में आने वाले दशकों में 7-25% की गिरावट का अनुमान है, तो हिसाब बदल जाता है। या तो अनुकूलन में बड़े निवेश से उत्पादन बढ़ाया जाए, या आयात बढ़ाया जाए, जो भारत जैसे विशाल देश के लिए वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव पर निर्भरता बढ़ाता है। दोनों विकल्प सरल नहीं हैं।
खाद्य मुद्रास्फीति (food inflation) इसका निकटतम संकेत है। एक हालिया वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र की वृद्धि मात्र 1.4% रही जबकि खाद्य मुद्रास्फीति 8% से ऊपर बनी रही। ग्रामीण मुद्रास्फीति लंबे समय तक शहरी मुद्रास्फीति से अधिक रही। ये आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) में दर्ज आंकड़े हैं जो UPSC प्रश्नों में सीधे उपयोग होते हैं।
यह विषय कृषि संकट से शहरी पलायन और असंगठित श्रम बाजार तक जाता है, जिसका विस्तार मैंने भारत में रोजगार की समस्या वाले लेख में किया है।
जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि पर सरकार की प्रमुख नीतियां और योजनाएं
Mains उत्तर में नीतिगत आयाम अनिवार्य है। योजनाओं के नाम नहीं, उनकी कार्यप्रणाली और सीमाएं जाननी हैं।
| पहल / योजना | क्या संबोधित करती है |
|---|---|
| NICRA (राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार) | ICAR की प्रमुख परियोजना, जलवायु-सहिष्णु फसल किस्में और कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित करना |
| PMFBY (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) | चरम मौसम से फसल हानि पर किसानों को मुआवजा देना |
| PM-KUSUM | सौर पंप योजना, वर्षा पर निर्भरता घटाने के लिए सस्ती सिंचाई का विस्तार |
| NMSA (राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन) | NAPCC के आठ मिशनों में से एक, जल-उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य और जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा |
| मिशन मौसम (Mission Mausam) | मौसम पूर्वानुमान को मजबूत करना और चरम मौसम घटनाओं के प्रभाव को कम करना |
| प्रति बूंद अधिक फसल (Per Drop More Crop) | सूक्ष्म सिंचाई (drip and sprinkler) को बढ़ावा देकर फसल की जल-आवश्यकता को वर्षा से अलग करना |
Mains के लिए ईमानदार मूल्यांकन: PMFBY में व्यावहारिक कठिनाइयां रही हैं, दावा निपटान दर कम, दस्तावेजों की कमी से सीमांत किसानों का बहिष्कार, और देरी से भुगतान। NICRA ने जलवायु-सहिष्णु किस्में विकसित की हैं लेकिन बड़े पैमाने पर उनका अपनाया जाना कृषि विस्तार सेवाओं की क्षमता पर निर्भर है जो अभी भी कमजोर है। योजना की मंशा और उसकी सीमा, दोनों लिखना ही परिपक्व उत्तर की पहचान है।
UPSC Mains में जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि को प्रभावशाली तरीके से कैसे लिखें?
यह विषय बहुउपयोगी है। मैं इसे इस तरह अलग-अलग प्रश्नपत्रों के लिए तैयार करता हूं।
GS1 -भूगोल: मानसून की कार्यप्रणाली पर प्रश्नों में अब जलवायु परिवर्तन को एक ढांचागत परिवर्तक के रूप में जोड़ें — अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का बदलता व्यवहार, अरब सागर का गर्म होना, तापमान प्रवणता (temperature gradient) का कमजोर पड़ना। यह समसामयिक जागरूकता दर्शाता है।
GS3 – कृषि और खाद्य सुरक्षा: सीधा उपयोग। उपज में गिरावट के अनुमान, वर्षाधीन कृषि की भेद्यता, खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव और सरकारी योजनाएं। NICRA के आंकड़े उद्धृत करें, यह एक सरकारी संस्था के आंकड़े हैं और उत्तर में विश्वसनीयता जोड़ते हैं।
GS3 – आपदा प्रबंधन (Disaster Management): बाढ़ और सूखा दोनों जलवायु परिवर्तन के तहत तीव्र हो रहे हैं। मानसून की अनिश्चितता को एक मिश्रित आपदा जोखिम (compound disaster risk) के रूप में प्रस्तुत करें, केवल बाढ़ या केवल सूखा नहीं, बल्कि एक ही मौसम में दोनों।
निबंध पत्र: “भारत की विकास गाथा और किसान”, “जलवायु न्याय”, “गर्म होती धरती में खाद्य सुरक्षा”, इन सभी विषयों में यह डेटा काम आता है। निबंध में व्यक्तिगत अनुभव मान्य है। यदि आप उस मानसून को देखते हुए बड़े हुए हैं जिस पर परिवार निर्भर था, तो वह जीवित समझ कोई पाठ्यपुस्तक नहीं दे सकती।
काम के साथ GS1 और GS3 की इस तरह की विषयवार तैयारी कैसे करें, इसके लिए मेरा दैनिक अध्ययन व्यवस्था वाला लेख देखें।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जलवायु परिवर्तन भारतीय मानसून को किस तरह प्रभावित कर रहा है?
जलवायु परिवर्तन मानसून की कुल वर्षा को बहुत अधिक कम नहीं कर रहा, बल्कि उसके स्वरूप को बदल रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं जबकि वर्षा वाले दिन घट रहे हैं। मौसम के भीतर लंबे शुष्क अंतराल आने लगे हैं। और वर्षा का भौगोलिक वितरण बदल रहा है, परंपरागत शुष्क क्षेत्रों में अधिक वर्षा और आर्द्र क्षेत्रों में कमी।
NICRA क्या है और UPSC उत्तरों में इसका उल्लेख क्यों जरूरी है?
NICRA यानी राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार, ICAR द्वारा शुरू की गई प्रमुख परियोजना है। इसके फसल उपज अनुमान, गेहूं में 19%, वर्षाधीन धान में 20-47% की संभावित गिरावट, सरकारी स्रोतों से हैं। Mains उत्तर में NICRA का नाम लेना दर्शाता है कि आप समाचार पत्रों की जगह प्राथमिक सरकारी स्रोत पर निर्भर हैं।
वर्षाधीन किसान सिंचित किसान की तुलना में जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित क्यों हैं?
सिंचित किसान वर्षा कम होने पर नहर या भूजल का सहारा ले सकता है। वर्षाधीन किसान के पास यह विकल्प नहीं, उसकी पूरी फसल का जल-बजट केवल मानसून पर निर्भर है। भारत के 80% से अधिक किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है और सिंचाई ढांचे में निवेश की कोई क्षमता नहीं। इसलिए वे किसी भी जलवायु आघात को अकेले और बिना किसी सुरक्षा जाल के झेलते हैं।
सिंधु-गंगा मैदान जलवायु परिवर्तन के लिए इतना संवेदनशील क्यों है?
यह मैदान विश्व के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में से एक है, प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ टन उत्पादन और वैश्विक गेहूं का 15% हिस्सा। गेहूं के दाना भरने की अवस्था में यह क्षेत्र ताप-तनाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। तापमान में मामूली वृद्धि भी इस पूरे क्षेत्र की उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
UPSC Mains में जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि किन प्रश्नपत्रों में आता है?
GS1 में भारतीय भूगोल के अंतर्गत मानसून की कार्यप्रणाली और उसमें बदलाव, GS3 में कृषि, खाद्य सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के अंतर्गत, तथा निबंध पत्र में जलवायु न्याय और विकास जैसे विषयों में। एक विषय की तैयारी चार संभावित उत्तर संदर्भों में काम आती है, इसीलिए यह विषय विशेष रूप से उपयोगी है।