ग्लोबल वार्मिंग, यानी भूमंडलीय तापमान वृद्धि, पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में वह दीर्घकालिक बढ़ोतरी जो मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों, खासकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और मीथेन, के कारण हो रही है। UPSC में यह GS3 पेपर, Essay Paper और Prelims तीनों में आता है। इसे ठीक से समझे बिना पर्यावरण की तैयारी अधूरी रहती है।
मैंने इस लेख में वह सब कुछ एक जगह इकट्ठा किया है जो एक UPSC aspirant को चाहिए जिसमें परिभाषा, विज्ञान, कारण, भारत पर प्रभाव, सरकार की नीतियाँ, अंतर्राष्ट्रीय समझौते, और Mains answers में सीधे काम आने वाले आँकड़े।
ग्लोबल वार्मिंग क्या है?
ग्लोबल वार्मिंग वह प्रक्रिया है जिसमें पृथ्वी का औसत सतह तापमान धीरे-धीरे और लगातार बढ़ रहा है। इसकी जड़ है enhanced greenhouse effect, यानी वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की इतनी अधिक मात्रा कि सूर्य की गर्मी पृथ्वी से बाहर नहीं जा पाती और अंदर ही फंसी रहती है।
अब तक पृथ्वी पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में लगभग 1.1°C गर्म हो चुकी है। यह संख्या भले ही छोटी लगे, लेकिन पृथ्वी के पैमाने पर यह एक विशाल ऊर्जा असंतुलन दर्शाती है, जिसका नतीजा है मौसम की चरम घटनाएं, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र का बढ़ता स्तर और कृषि पर बढ़ता दबाव।
ग्लोबल वार्मिंग किसे कहते हैं?
सरल शब्दों में: जब मानवीय गतिविधियों के कारण वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती हैं और इससे पृथ्वी का औसत तापमान लंबे समय तक बढ़ता रहता है उसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
UPSC के लिए एक जरूरी अंतर: ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ तापमान वृद्धि के बारे में है, जबकि climate change एक व्यापक शब्द है जिसमें तापमान के साथ-साथ बदलते वर्षा पैटर्न, समुद्र स्तर वृद्धि, तूफानों की बढ़ती तीव्रता और जैव विविधता का नुकसान भी शामिल है। Mains answers में इस फर्क को स्पष्ट रखें इससे आपकी conceptual clarity झलकती है।
UPSC में ग्लोबल वार्मिंग कहाँ-कहाँ आता है?
किसी topic को पढ़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि वह exam में कहाँ काम आएगा। ग्लोबल वार्मिंग एक single-paper topic नहीं है।
GS Paper 3 : पर्यावरण और पारिस्थितिकी
यह सबसे प्रमुख जगह है। लगभग हर वर्ष प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई न कोई प्रश्न ज़रूर आता है जिसमें कारण, प्रभाव, भारत की स्थिति, अंतर्राष्ट्रीय समझौते, और नीतिगत प्रतिक्रिया पूछे जाते हैं। यहाँ analytical questions भी आते हैं जिनमें सिर्फ facts नहीं, एक position लेनी होती है।
Essay Paper
ग्लोबल वार्मिंग Essay Paper में कई रूपों में आ सकता है जिसमें सीधे topic के रूप में, या सतत विकास, उत्तर-दक्षिण विभाजन, भारत की विकास चुनौतियों के संदर्भ में पूछे जाते हैं। यहाँ सिर्फ facts नहीं चलते, एक स्पष्ट thesis और उसे support करने वाला analysis चाहिए।
Prelims
यहाँ सटीक जानकारी पूछी जाती है जैसे कि गैसों का GWP, NAPCC के मिशनों की संख्या, पेरिस समझौते की शर्तें, भारत के NDC लक्ष्य। इसीलिए इस article के अंत में दिया गया data table ध्यान से पढ़ें।
ग्लोबल वार्मिंग का विज्ञान : ग्रीनहाउस इफेक्ट
ग्रीनहाउस इफेक्ट एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो पृथ्वी को रहने योग्य बनाती है। CO₂, मीथेन, जलवाष्प और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें पृथ्वी से निकलने वाली infrared radiation को अवशोषित करती हैं और उसे वापस पृथ्वी की ओर re-emit करती हैं। इस प्रक्रिया के बिना पृथ्वी का औसत तापमान −18°C होता जो अभी +15°C है।
समस्या greenhouse effect का होना नहीं है। समस्या यह है कि मानवीय गतिविधियों ने वायुमंडल में इन गैसों की मात्रा इतनी तेज़ी से बढ़ा दी है कि पृथ्वी की energy balance बिगड़ गई है। यही enhanced greenhouse effect है और यही ग्लोबल वार्मिंग की जड़ है।
ग्रीनहाउस गैसें : Prelims के लिए यह table याद करें
| ग्रीनहाउस गैस | मुख्य मानव स्रोत | उत्सर्जन में हिस्सा | GWP (100 वर्ष) |
|---|---|---|---|
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) | जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई | ~76% | 1 (आधार) |
| मीथेन (CH₄) | पशुपालन, धान की खेती, landfill, प्राकृतिक गैस | ~16% | 25-28 गुना |
| नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) | उर्वरक, कृषि, उद्योग | ~6% | 265-298 गुना |
| F-गैसें (HFCs, PFCs, SF₆) | Refrigerants, औद्योगिक प्रक्रियाएं | ~2% | सैकड़ों से हजारों गुना |
Prelims के लिए एक ज़रूरी बात: मीथेन, भले ही कुल उत्सर्जन में केवल 16% है, CO₂ की तुलना में 25-28 गुना अधिक शक्तिशाली है 100 वर्षों में और 20 वर्षों में 80 गुना से भी ज्यादा। इसीलिए मीथेन कटौती को निकट-भविष्य में तापमान नियंत्रण का सबसे तेज़ उपाय माना जाता है।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण
मानव-जनित कारण (Anthropogenic)
ये वर्तमान वार्मिंग के प्रमुख कारण हैं। UPSC इनका स्पष्ट वर्गीकरण चाहता है:
- जीवाश्म ईंधन का दहन : कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस बिजली, परिवहन और उद्योग के लिए जलाए जाते हैं। यह CO₂ का सबसे बड़ा एकल स्रोत है।
- वनों की कटाई : जंगल कार्बन sink का काम करते हैं। उन्हें काटने पर संचित कार्बन वायुमंडल में चला जाता है। वनों की कटाई वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 10% का योगदान करती है।
- कृषि और पशुपालन : मवेशी और धान की खेती मीथेन के बड़े स्रोत हैं। Synthetic fertilizers से नाइट्रस ऑक्साइड निकलती है।
- औद्योगिक प्रक्रियाएं : सीमेंट, इस्पात और रसायन उत्पादन में CO₂ और F-gases सीधे उत्सर्जित होती हैं।
- शहरीकरण : Heat islands, बढ़ती ऊर्जा मांग, और भूमि उपयोग परिवर्तन।
- कचरा प्रबंधन : Landfill में जैविक कचरे के सड़ने से भारी मात्रा में मीथेन निकलती है।
प्राकृतिक कारण : और क्यों वे पर्याप्त जिम्मेदार नहीं हैं
ज्वालामुखी विस्फोट, सौर विकिरण में बदलाव और समुद्री धाराओं में परिवर्तन, ये प्राकृतिक कारक भूगर्भिक समय में पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करते हैं। लेकिन वैज्ञानिक सहमति स्पष्ट है: अकेले प्राकृतिक कारण औद्योगिक क्रांति के बाद से देखी जा रही तापमान वृद्धि की दर और पैटर्न की व्याख्या नहीं कर सकते। IPCC ने कहा है कि मानवीय प्रभाव ही वर्तमान warming का प्रमुख कारण है।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव
वैश्विक प्रभाव
- औसत तापमान में वृद्धि और लू (heatwave) की बढ़ती घटनाएं
- समुद्र स्तर में वृद्धि वर्तमान में ~3.3mm प्रति वर्ष, जो तेज़ होती जा रही है
- ध्रुवीय बर्फ और पर्वतीय ग्लेशियरों का तेज़ पिघलना
- चक्रवात, बाढ़ और सूखे की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता
- समुद्र का अम्लीकरण CO₂ घुलने से carbonic acid बनती है जो मूंगा चट्टानों को नुकसान पहुंचाती है
- जैव विविधता का नुकसान जो प्रजातियाँ तेज़ तापमान बदलाव के अनुकूल नहीं हो सकतीं, वे विलुप्त होने के खतरे में हैं
भारत पर प्रभाव : Mains में यह जरूर लिखें
भारत की भौगोलिक स्थिति इसे जलवायु परिवर्तन के सामने विशेष रूप से कमजोर बनाती है। Mains answers में हमेशा global effects को भारतीय संदर्भ तक लाएं। विस्तृत जानकारी के लिए देखें: भारत पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव।
- हिमालयी ग्लेशियरों का पीछे हटना : गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों पर निर्भर 60 करोड़ से अधिक लोगों की जल सुरक्षा खतरे में है
- मानसून में बदलाव : देर से आना, असमान वितरण, और छोटी अवधि में अत्यधिक वर्षा, कृषि और जल उपलब्धता दोनों प्रभावित
- तटीय खतरा : भारत की 7,516 किमी तटरेखा पर मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर समुद्र स्तर वृद्धि के सामने असुरक्षित हैं
- कृषि पर दबाव : बढ़ता तापमान गेहूं और धान की पैदावार घटाता है; फसल के महत्वपूर्ण growth stages में heat stress बढ़ रहा है
- चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता : गर्म होता बंगाल की खाड़ी भारत के पूर्वी तट पर अधिक शक्तिशाली चक्रवात बना रहा है
- शहरी ताप तनाव : शहरों में बढ़ते तापमान से heat-related मृत्यु दर और cooling energy demand दोनों बढ़ रहे हैं
भारत की भेद्यता : Mains में काम आने वाले आँकड़े
Mains answers बिना data के कमज़ोर होते हैं। ये figures याद रखें और अपने answers में use करें:
- भारत कुल उत्सर्जन में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा emitter है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (~2.5 टन CO₂e) वैश्विक औसत (~7 टन) से बहुत कम है|
- कृषि भारत की GDP में ~18% योगदान देती है और लगभग 46% कार्यबल को रोज़गार देती है, यह सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र है
- हिमालयी cryosphere में लगभग 600 अरब टन बर्फ संग्रहीत है, दक्षिण एशिया का एक महत्वपूर्ण जल भंडार
- भारत की 7,516 किमी तटरेखा पर कई बड़े शहर निचले तटीय क्षेत्रों में स्थित हैं
भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC)
भारत ने 2008 में NAPCC शुरू की, जलवायु परिवर्तन से निपटने का भारत का मुख्य घरेलू नीतिगत ढांचा। इसमें 8 राष्ट्रीय मिशन हैं: राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन, ऊर्जा दक्षता मिशन, सतत आवास मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र मिशन, हरित भारत मिशन, सतत कृषि मिशन, और जलवायु परिवर्तन के लिए रणनीतिक ज्ञान मिशन। इन सभी मिशनों की विस्तृत जानकारी के लिए देखें: NAPCC — सम्पूर्ण गाइड।
भारत की NDC प्रतिबद्धताएं
Paris Agreement के तहत भारत की updated NDC में तीन प्रमुख लक्ष्य हैं:
- 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 2005 के स्तर से 45% की कमी।
- 2030 तक 50% बिजली उत्पादन गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से।
- जंगल और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त carbon sink बनाना।
Net Zero लक्ष्य
भारत ने 2070 तक net zero emissions हासिल करने का संकल्प लिया है। यह वर्ष Essays और Mains answers दोनों में quote करने लायक है, यह भारत की विकास आवश्यकताओं और जलवायु जिम्मेदारी के बीच का संतुलन दर्शाता है।
अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे : UPSC के लिए जरूरी
UNFCCC
1992 के Rio Earth Summit में हस्ताक्षरित United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) जलवायु परिवर्तन पर मूलभूत अंतर्राष्ट्रीय संधि है। इसने Common But Differentiated Responsibilities (CBDR) का सिद्धांत स्थापित किया, यह मानते हुए कि सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है। भारत अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में CBDR को लगातार उठाता है, यह India’s negotiating position का core है।
पेरिस समझौता (2015)
आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु संधि। UPSC के लिए इसकी मुख्य बातें:
- वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफी नीचे रखना; 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास।
- प्रत्येक देश Nationally Determined Contributions (NDCs) जमा करता है, स्वैच्छिक राष्ट्रीय जलवायु प्रतिज्ञाएं।
- विकसित देशों ने विकासशील देशों के लिए प्रति वर्ष $100 बिलियन जलवायु वित्त जुटाने की प्रतिबद्धता जताई।
- Loss and Damage mechanism, यह स्वीकार करते हुए कि कुछ जलवायु प्रभाव अपरिहार्य हैं और सबसे कमज़ोर देशों को समर्थन चाहिए।
IPCC
1988 में UNEP और WMO द्वारा स्थापित Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) जलवायु विज्ञान का आकलन करने वाली UN संस्था है। यह मूल शोध नहीं करती बल्कि peer-reviewed scientific literature का संश्लेषण कर Assessment Reports तैयार करती है जो नीति-निर्माण का आधार बनते हैं। इसकी Sixth Assessment Report (AR6) ने निष्कर्ष दिया कि मानवीय प्रभाव ने निर्विवाद रूप से जलवायु को गर्म किया है।
याद रखने वाले महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | आँकड़ा / उत्तर |
|---|---|
| पूर्व-औद्योगिक स्तर से वर्तमान तापमान वृद्धि | ~1.1°C |
| Paris Agreement का तापमान लक्ष्य | 2°C से काफी नीचे; 1.5°C का प्रयास |
| कुल GHG उत्सर्जन में CO₂ का हिस्सा | ~76% |
| मीथेन का GWP (100 वर्ष) | 25–28 गुना CO₂ से अधिक |
| नाइट्रस ऑक्साइड का GWP (100 वर्ष) | 265–298 गुना CO₂ से अधिक |
| वैश्विक उत्सर्जन में भारत का स्थान (कुल) | तीसरा सबसे बड़ा |
| भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन | ~2.5 टन CO₂e (वैश्विक औसत ~7 टन) |
| भारत का NDC intensity reduction लक्ष्य | 2030 तक 45% कमी (2005 के स्तर से) |
| भारत का NDC renewable energy लक्ष्य | 2030 तक 50% बिजली गैर-जीवाश्म से |
| भारत का Net Zero लक्ष्य | 2070 |
| NAPCC के मिशनों की संख्या | 8 |
| समुद्र स्तर वृद्धि की दर | ~3.3mm प्रति वर्ष (तेज़ होती जा रही है) |
| भारत की तटरेखा की लंबाई | 7,516 किमी |
| ग्लेशियर-fed नदियों पर निर्भर जनसंख्या | 60 करोड़+ |
| UNFCCC पर हस्ताक्षर | Rio Earth Summit, 1992 |
| IPCC की स्थापना | 1988 (UNEP + WMO) |
Essay में ग्लोबल वार्मिंग को कैसे लिखें
अगर Essay Paper में ग्लोबल वार्मिंग का prompt आए, तो यह structure use करें:
- एक ठोस opening : कोई specific data point या जमीनी हकीकत से शुरू करें। Abstract philosophical opening से बचें।
- विज्ञान एक paragraph में : Greenhouse effect, वार्मिंग का पैमाना, और यह क्यों human-caused है।
- भारत का संदर्भ : हिमालयी ग्लेशियर, मानसून, तटीय शहर, कृषि। Essay को भारत तक जरूर लाएं।
- Equity का तर्क : भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बहुत कम है। CBDR सिद्धांत। विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी। यही वह analytical layer है जो एक average essay को excellent बनाती है।
- Solutions और भारत की प्रतिक्रिया जैसे कि NAPCC, NDC, renewable energy push, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं।
- Forward-looking conclusion, सारांश नहीं, एक perspective। भारत कैसे दिखा सकता है कि विकास और climate action साथ-साथ संभव है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ग्लोबल वार्मिंग को हिंदी में क्या कहते हैं?
ग्लोबल वार्मिंग को हिंदी में भूमंडलीय तापमान वृद्धि या वैश्विक ऊष्मीकरण कहते हैं। UPSC में आमतौर पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ ही प्रयुक्त होता है, लेकिन हिंदी माध्यम के उत्तरों में इसका हिंदी समकक्ष भी लिखा जा सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग और climate change में क्या फर्क है?
ग्लोबल वार्मिंग केवल पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को संदर्भित करती है। Climate change एक व्यापक शब्द है इसमें तापमान वृद्धि के साथ-साथ बदलते वर्षा पैटर्न, समुद्र स्तर वृद्धि, चरम मौसम घटनाएं और पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तन भी शामिल हैं। Mains में इस अंतर को स्पष्ट रखना आपकी conceptual clarity दर्शाता है।
ग्लोबल वार्मिंग के लिए कौन सी गैस सबसे ज्यादा जिम्मेदार है?
मात्रा के हिसाब से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, कुल उत्सर्जन का ~76%। लेकिन शक्ति (GWP) के हिसाब से मीथेन (CH₄) 100 वर्षों में CO₂ से 25–28 गुना अधिक प्रभावशाली है। Prelims में यह distinction सीधे MCQ के रूप में आता है।
भारत का Net Zero लक्ष्य क्या है और यह UPSC में क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत ने 2070 तक net zero emissions हासिल करने का लक्ष्य रखा है। यह UPSC में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की Paris Agreement के तहत दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धता है, भारत की विकास आवश्यकताओं और जलवायु जिम्मेदारी के बीच के तनाव को दर्शाता है, और GS3 analytical questions व Essay Paper दोनों में इसे quote किया जा सकता है।